Monday, April 16, 2018

यदि नई दुनिया पुरानी दुनिया से भिन्न है तो नई दुनिया को पुरानी दुनिया से अधिक धर्म की जरूरत है :- डा.आंबेडकर



ललितपुर ब्यूरो कस्बा मड़ावरा के एक विद्यालय में भारत के संविधान निर्माता, चिंतक, समाज सुधारक भारत रत्न बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर का जन्मोत्सव धूमधाम के साथ मनाया गया। बाबा साहब के जन्मदिन के अवसर पर प्रधानाचार्य रामसजीवन प्रजापति की अध्यक्षता में गोष्ठी का आयोजन किया गया। गोष्ठी में उन्होंने कहा कि बाबा साहेब ने कहा था मैं पहले भरतीय हूँ और बाद में भी भारतीय हूँ। उन्होंने बाबा साहब के जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इनका जन्म मध्य प्रदेश के मऊ में 14 अप्रैल 1891 को हुआ था। उनके पिता का नाम रामजी मालोजी सकपाल और माता का नाम भीमाबाई था। वे अपने माता-पिता की चौदहवीं संतान थे। बाबा साहेब डा.अम्बेडकर का परिवार महार जाति से संबंध रखता था। जिसे अछूत माना जाता था। बचपन से ही आर्थिक और सामाजिक भेदभाव देखने वाले डा.अम्बेडकर ने विषम परिस्थितियों में पढ़ाई शुरू की। बाल विवाह प्रचलित होने के कारण 1906 में उनकी शादी नौ साल की लड़की रमाबाई से हुई। 1908 में उन्होंने एलफिंस्टन कॉलेज में प्रवेश लिया। इस कॉलेज में प्रवेश लेने वाले वे पहले दलित जाति के बच्चे थे। 1913 में एमए करने के लिए वे अमेरिका चले गए। अमेरिका में पढ़ाई करना बड़ौदा के गायकवाड़ शासक सहयाजी राव तृतीय से मासिक वजीफा मिलने के कारण संभव हो सका था। 1921 में लंदन स्कूल ऑफ इकॉनोमिक्स से उन्हें एमए की डिग्री मिली। 1925 में बाबा साहेब को बॉम्बे प्रेसिडेंसी समिति ने साइमन आयोग में काम करने के लिए नियुक्त किया। इस आयोग का विरोध पूरे भारत में किया गया था। अंबेडकर दलितों पर हो रहे अत्याचार के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए बहिष्कृत भारत, मूक नायक, जनता नाम के पाक्षिक और साप्ताहिक पत्र निकालने शुरू किये। भारत की आजादी के बाद उन्हें कानून मंत्री बनाया गया। 29 अगस्त, 1947 को स्वतंत्र भारत के संविधान रचना के लिए संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया। 1951 में संसद में अपने हिन्दू कोड बिल मसौदे को रोके जाने के बाद अंबेडकर ने मंत्रीमंडल से इस्तीफा दे दिया. इस मसौदे में उत्तराधिकार, विवाह और अर्थव्यवस्था के कानूनों में लैंगिक समानता की बात कही गई थी।  14 अक्टूबर 1956 को अंबेडकर और उनके समर्थकों ने पंचशील को अपनाते हुए बौद्ध धर्म ग्रहण किया. अंबेडकर का मानना था कि हिंदू धर्म के अंदर दलितों को कभी भी उनका अधिकार नहीं मिल सकता है. 6 दिसंबर, 1956 को अंबेडकर की मृत्यु हो गई। गोष्ठी में विचार व्यक्त करते हुए वक्ता मानसिंह ने कहा कि 14 अक्टूबर 1956 को आंबेडकर ने बौद्ध धर्म अपनाया था. वे देवताओं के संजाल को तोड़कर एक ऐसे मुक्त मनुष्य की कल्पना कर रहे थे जो धार्मिक तो हो लेकिन गैर-बराबरी को जीवन मूल्य न माने। यदि नई दुनिया पुरानी दुनिया से भिन्न है तो नई दुनिया को पुरानी दुनिया से अधिक धर्म की जरूरत है। डा.आंबेडकर ने यह बात 1950 में 'बुद्ध और उनके धर्म का भविष्यÓ नामक एक लेख में कही थी। वे कई बरस पहले से ही मन बना चुके थे कि वे उस धर्म में अपना प्राण नहीं त्यागेंगे जिस धर्म में उन्होंने अपनी पहली सांस ली है। 14 अक्टूबर 1956 को उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया। आज उनके इस निर्णय को याद करने का दिन है. यह उनका कोई आवेगपूर्ण निर्णय नहीं था। बल्कि इसके लिए उन्होंने पर्याप्त तैयारी की थी। उन्होंने भारत की सभ्यतागत समीक्षा की. उसके सामाजिक-आर्थिक ढांचे की बनावट को विश्लेषित किया था और सबसे बढ़कर हिंदू धर्म को देखने का विवेक विकसित किया। जब अंग्रेजों से भारत की आजादी की लड़ाई लड़ी जा रही थी तो यह बात महसूस की गई थी कि भारत को अपनी अंदरूनी दुनिया में समतापूर्ण और न्यायपूर्ण होना है। अगर भारत एक आजाद मुल्क बनेगा तो उसे सबको समान रूप से समानता देनी होगी। केवल सामाजिक समानता और सदिच्छा से काम नहीं चलने वाला है। सबको इस देश के शासन में भागीदार बनाना होगा. डाक्टर आंबेडकर इस विचार के अगुवा थे। 1930 का दशक आते-आते भारत की आजादी की लड़ाई का सामाजिक आधार पर्याप्त विकसित हो चुका था। इसमें विभिन्न समूहों की आवाजें शामिल हो रही थीं। अब आजादी की लड़ाई केवल औपनिवेशिक सत्ता से लड़ाई मात्र तक सीमित न रहकर इतिहास में छूट गए लोगों के जीवन को इसमें समाहित करने की लड़ाई के रूप में तब्दील हो रही थी। जिनके हाथ में पुस्तकें और उन्हें सृजित करने की क्षमता थी। उन्होंने बहुत से समुदायों के जीवन को मुख्यधारा से स्थगित सा कर दिया था। शोषण के सांस्कृतिक, आर्थिक एवं राजनीतिक दासत्व के प्रकट-अप्रकट तन्तुओं को रेशा-रेशा अलग करके और इनसे मुक्ति पाने की कोशिशें शुरू हुईं। आंबेडकर आजादी की लड़ाई के राजनीतिक और ज्ञानमीमांसीय स्पेस में दलितों को ले आने में सफल हुए. उन्होंने कहा कि दलितों के साथ न्याय होना चाहिए। 1932 में पूना समझौते से पहले किए गए उनके प्रयासों को हम इस दिशा में देख-समझ सकते हैं। यद्यपि इस समय दलितों को पृथक निर्वाचक-मंडल नहीं मिल सका लेकिन अब उन्हें उपेक्षित नही किया जा सकता था. जब भारत आजाद हुआ तो देश का संविधान बना. सबको चुनाव लडऩे और अपने मनपसंद व्यक्ति को अपना नेता चुनने की आजादी मिली। आज दलित अपना नेता चुन रहे हैं, वे नेता के रूप में चुने जा रहे हैं. भारत के संविधान में आंबेडकर की इन अनवरत लड़ाइयों की खुशबू फैली है। उनके जीवन और आत्मा में प्रकाश शिक्षा ही ला सकती है. यही उन्हें उस दासता से मुक्त करेगी जिसे समाज, धर्म और दर्शन ने उनके नस-नस में आरोपित कर दिया है। इस दासता को दलितों को अपनी नियति मान लेने को कहा गया था। आंबेडकर इसे तोड़ देना चाहते थे। संजाल को तोड़कर एक ऐसे मुक्त मनुष्य की कल्पना कर रहे थे जो धार्मिक तो हो लेकिन गैर-बराबरी को जीवन मूल्य न माने. इसलिए जब अक्टूबर 1956 में उन्होंने हिंदू धर्म से अपना विलगाव किया तो उन्होंने स्वयं और अपने अनुयायियों को बाइस प्रतिज्ञाएं करवाईं।
               वक्ता रामकिशोर शुक्ला ने कहा कि आंबेडकर आधुनिकता, लोकतंत्र और न्याय की संतान थे. वे पेशे से वकील भी थे. मनुष्य की गरिमा को बराबरी दिए बिना वे आधुनिकता, लोकतंत्र और न्याय की कल्पना भी नहीं कर सकते थे। उन्होंने भारतीय समाज में घर और बाहर-दोनों जगह स्त्रियों की बराबरी के लिए संघर्ष किए. जब वे जवाहरलाल नेहरू की सरकार में विधिमंत्री बने तो उन्होंने स्त्रियों को न केवल घरेलू दुनिया में बल्कि उन्हें आर्थिक और लैंगिक रूप से मजबूत बनाने के लिए हिंदू कोड बिल प्रस्तुत किया। यह बिल पास नहीं होने दिया गया. आंबेडकर ने इस्तीफा दे दिया। हमें इसे जानना चाहिए कि यह बिल क्यों पास नही होने दिया गया? यदि हम यह जान सकें तो अपने आपको न्याय की उस भावना के प्रति समर्पित कर पाएंगे जिसका सपना डाक्टर भीमराव आंबेडकर ने देखा था। गोष्ठी में सरस्वती मंदिर इण्टर कालेज के प्रधानाचार्य रामसजीवन प्रजापति, प्रवक्ता भवनीशंकर, रामकिशोर शुक्ला, मानसिंह, हरिशरण चौरसिया, संतोष त्रिपाठी, प्रताप सिंह, राहुल झा, पवन सिंह, खिलावन सिंह, घूमन सिंह, पंचमलाल, अनिल कुमार, दीपिका तिवारी, हफीजन बानों, वैशाली, मानबेन्द्र, दिलीप दुवे, मनहोर आदि उपस्थित रहे तथा विचार व्यक्त किये। कार्यक्रम का संचालन संतोष त्रिपाठी ने किया।
रिपोर्ट अमित अग्रवाल

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